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बढ़ते संविदाकरण के संदर्भ में आसानी से बर्खास्त किए जाने (Easily Dismissed) की समस्या

 बढ़ते संविदाकरण के संदर्भ में आसानी से बर्खास्त किए जाने (Easily Dismissed) की समस्या एक प्रमुख चिंता के रूप में उभरी है, जो श्रमिकों के अधिकारों और नौकरी की सुरक्षा पर गंभीर नकारात्मक प्रभाव डालती है। बढ़ते संविदाकरण का संदर्भ: भारत में आर्थिक उदारीकरण के बाद से, श्रम लागत को नियंत्रित करने और बाजार की मांगों को पूरा करने के लिए कंपनियां, विशेष रूप से सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (PSEs) भी, संविदा पर कर्मचारियों को नियुक्त करने लगी हैं। गिग इकोनॉमी के उदय के साथ यह प्रवृत्ति और भी बढ़ गई है, जिससे अस्थायी रोजगार व्यवस्थाओं में वृद्धि हुई है। हालांकि, यह मॉडल नियोक्ताओं को लचीलापन प्रदान करता है, लेकिन इसके साथ ही नौकरी की सुरक्षा की कमी, लाभों से वंचित रहना और श्रमिकों के साथ अनुचित व्यवहार जैसी समस्याएं भी आती हैं। आसानी से बर्खास्त किए जाने की स्थिति: मनमानी बर्खास्तगी और नौकरी की असुरक्षा: संविदा कर्मचारियों को अक्सर बिना किसी कारण या पूर्व सूचना के बर्खास्त कर दिया जाता है । इस प्रथा से प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन होता है और श्रमिकों को निरंतर असुरक्षा की ...

संविदाकरण का बढ़ता चलन और इसके कारण

संविदाकरण (Contractualisation) से श्रमिकों के अधिकारों और नौकरी की सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, जिससे व्यापक प्रणालीगत मुद्दे उत्पन्न होते हैं। संविदाकरण का बढ़ता चलन और इसके कारण: भारत में आर्थिक उदारीकरण के बाद से, कंपनियां श्रम लागत को नियंत्रित करने और बाजार की मांगों को पूरा करने के लिए संविदा पर कर्मचारियों को नियुक्त करने लगी हैं। यह प्रवृत्ति सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSEs) सहित विभिन्न क्षेत्रों में स्पष्ट रूप से दिखती है। संविदा रोजगार नियोक्ताओं को विशिष्ट परियोजनाओं या निश्चित अवधि के लिए कर्मचारियों को काम पर रखने का अवसर प्रदान करता है, जिससे उन्हें स्थायी रोजगार से जुड़ी लंबी अवधि की प्रतिबद्धताओं और दायित्वों से बचने में मदद मिलती है। सरकारी क्षेत्र में वृद्धि: 2014 में, भारत में कुल सरकारी कार्यबल का 43% (12.3 मिलियन लोग) अस्थायी नौकरियों में लगे हुए थे । केंद्र सरकार ने भी पिछले पाँच वर्षों में संविदा नियुक्तियों में वृद्धि दर्ज की है। विनिर्माण और सेवा क्षेत्र: संगठित विनिर्माण क्षेत्र में कुल रोजगार में संविदा श्रमिकों का हिस्सा 2000-01 में 15.7%...

बिहार में विशेष सर्वेक्षण एवं DILRMP (Digital India Land Records and Modernization Programme) : संविदा कर्मियों के साथ अन्याय

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भारत सरकार ने वर्ष 2008 में डिजिटल इंडिया लैंड रिकॉर्ड्स मॉडर्नाइज़ेशन प्रोग्राम (DILRMP) शुरू किया था। इसका मुख्य उद्देश्य भूमि अभिलेखों का आधुनिकीकरण करना, विवादों को कम करना और जनता को पारदर्शी सेवाएँ उपलब्ध कराना है। इस कार्यक्रम में – भूमि अभिलेखों का कंप्यूटरीकरण, सर्वेक्षण(Survey)/पुनः सर्वेक्षण( Resurvey), रजिस्ट्री और भूमि रिकॉर्ड का आपसी एकीकरण, आधुनिक तकनीक (ETS, Drone, GIS) से नक्शे बनाना, और जनता को ऑनलाइन सुविधा उपलब्ध कराना शामिल है। बिहार में इस सर्वेक्षण को  विशेष सर्वेक्षण एवं बंदोबस्त कार्यक्रम (Vishesh Sarvekshan evam Bandobast Karyakram) के रूप में लागू किया गया है। यह बेहद ज़रूरी है क्योंकि बिहार के ज़्यादातर भूमि रिकॉर्ड अंग्रेज़ों के समय (1905–1915) के हैं, जो आज की वास्तविक स्थिति को नहीं दर्शाते। पुराने रिकॉर्ड और गलत सीमांकन के कारण बिहार में हज़ारों भूमि विवाद लंबित हैं। संविदा कर्मियों पर आधारित मॉडल दुर्भाग्यवश, बिहार में इस महत्वाकांक्षी कार्यक्रम का पूरा भार संविदा कर्मियों – अमीन, कानूनगो और तकनीकी कर्मचारियों – पर डाला गया है। अन्य राज्यों में ...