संविदाकरण का बढ़ता चलन और इसके कारण

संविदाकरण (Contractualisation) से श्रमिकों के अधिकारों और नौकरी की सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, जिससे व्यापक प्रणालीगत मुद्दे उत्पन्न होते हैं।

संविदाकरण का बढ़ता चलन और इसके कारण: भारत में आर्थिक उदारीकरण के बाद से, कंपनियां श्रम लागत को नियंत्रित करने और बाजार की मांगों को पूरा करने के लिए संविदा पर कर्मचारियों को नियुक्त करने लगी हैं। यह प्रवृत्ति सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSEs) सहित विभिन्न क्षेत्रों में स्पष्ट रूप से दिखती है। संविदा रोजगार नियोक्ताओं को विशिष्ट परियोजनाओं या निश्चित अवधि के लिए कर्मचारियों को काम पर रखने का अवसर प्रदान करता है, जिससे उन्हें स्थायी रोजगार से जुड़ी लंबी अवधि की प्रतिबद्धताओं और दायित्वों से बचने में मदद मिलती है।

  • सरकारी क्षेत्र में वृद्धि: 2014 में, भारत में कुल सरकारी कार्यबल का 43% (12.3 मिलियन लोग) अस्थायी नौकरियों में लगे हुए थे। केंद्र सरकार ने भी पिछले पाँच वर्षों में संविदा नियुक्तियों में वृद्धि दर्ज की है।
  • विनिर्माण और सेवा क्षेत्र: संगठित विनिर्माण क्षेत्र में कुल रोजगार में संविदा श्रमिकों का हिस्सा 2000-01 में 15.7% से बढ़कर 2010-11 में 26.47% हो गया। गिग इकोनॉमी के उदय के कारण भी अस्थायी रोजगार व्यवस्था में वृद्धि हुई है, जिसमें अक्सर लाभ, नौकरी की सुरक्षा और उचित व्यवहार की कमी होती है।
  • स्वरोजगार में वृद्धि: संविदाकरण के साथ-साथ स्वरोजगार (self-employment) की प्रवृत्ति भी बढ़ रही है, जो अक्सर विकल्प नहीं बल्कि एक आवश्यकता होती है। अनौपचारिक क्षेत्र में 80% से अधिक श्रमिक स्वरोजगार में वर्गीकृत हैं, लेकिन वे निर्वाह स्तर पर काम करते हैं, उनके पास पूंजी या सामाजिक सुरक्षा तक पहुंच बहुत कम होती है।

बिगड़ती रोज़गार स्थितियाँ (Worsening Employment Conditions): संविदाकरण के बढ़ने से श्रमिकों की रोज़गार स्थितियों में कई तरह से गिरावट आई है:

  1. कम वेतन और लाभों से वंचित: संविदा श्रमिकों को अक्सर सीधे नियोजित श्रमिकों की तुलना में लगभग आधा वेतन मिलता है। उन्हें पेंशन, भविष्य निधि, स्वास्थ्य बीमा और सवेतन अवकाश जैसे मौलिक लाभों से वंचित रखा जाता है, भले ही उनका कार्यकाल दशकों तक क्यों न चला हो। कंपनियाँ इन श्रमिकों को कम भुगतान, बहुत कम या कोई लाभ नहीं, नौकरी की सुरक्षा की कमी और असुरक्षित काम करने की स्थिति प्रदान करके उनका फायदा उठाती हैं।
  2. नौकरी की असुरक्षा और मनमानी बर्खास्तगी: संविदा कर्मचारियों को अक्सर बिना किसी कारण या सूचना के बर्खास्त कर दिया जाता है, जैसा कि कुछ मामलों में देखा गया है। यह उन्हें लगातार असुरक्षा की स्थिति में रखता है। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने कहा है कि केवल अनुबंध की अवधि से आगे जारी रहने से संविदा कर्मचारी नियमितीकरण या स्थायीकरण का हकदार नहीं हो जाता। हालांकि, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने दोहराया है कि दुराचार के आरोप में अनुबंध समाप्त करने पर कर्मचारी को सुनवाई का अवसर दिए बिना ऐसा करना अस्वीकार्य है।
  3. कैरियर में प्रगति का अभाव: संविदा कर्मचारियों को अक्सर कौशल विकास, पदोन्नति या वेतन वृद्धि के अवसरों से बाहर रखा जाता है। वे अपनी भूमिकाओं में स्थिर रहते हैं, जिससे नियमित कर्मचारियों और उनके बीच एक प्रणालीगत असमानता पैदा होती है। दिल्ली के सरकारी निकायों में एक अध्ययन में पाया गया कि संविदा कर्मचारियों को उनकी शिक्षा, अनुभव और एक दशक से अधिक के योगदान के लिए भी प्रशंसा नहीं मिलती, बल्कि उनके रोजगार अनुबंध के आधार पर ही उनके साथ व्यवहार किया जाता है।
  4. शोषण और अनुचित व्यवहार: विशेष रूप से सरकारी संस्थानों में अस्थायी कर्मचारियों को अक्सर बहुआयामी शोषण का सामना करना पड़ता है। नियोक्ताओं द्वारा "अस्थायी" लेबल का दुरुपयोग किया जाता है, जबकि कर्मचारी अनिवार्य, आवर्ती और संस्था के कामकाज के लिए अभिन्न कार्य करते हैं। इससे श्रमिकों को नियमित कर्मचारियों के हकदार सम्मान, सुरक्षा और लाभों से वंचित किया जाता है। दिल्ली में किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि संविदा कर्मचारियों को अपने कार्यस्थल और सामाजिक दायरे में बार-बार अशिष्ट, अपमानजनक और पक्षपातपूर्ण व्यवहार का सामना करना पड़ता है। उनके वरिष्ठों द्वारा अक्सर अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया जाता है और गोपनीय कार्य उन्हें नहीं सौंपे जाते।
  5. आउटसोर्सिंग का दुरुपयोग: संस्थान तेजी से अस्थायी कर्मचारियों द्वारा निभाई गई भूमिकाओं को आउटसोर्स कर रहे हैं, प्रभावी रूप से एक शोषित श्रमिकों के समूह को दूसरे से बदल रहे हैं। यह प्रथा न केवल शोषण को कायम रखती है बल्कि नियमित रोजगार की पेशकश के दायित्व से बचने का एक जानबूझकर प्रयास भी दर्शाती है। सिक्किम उच्च न्यायालय के एक मामले में, एक याचिकाकर्ता को बाद में पता चला कि उसे और उसके अधिकांश सहकर्मियों को आउटसोर्स किया गया था, हालांकि वह एक स्थायी पद पर काम कर रही थी और वही काम कर रही थी जो अन्य स्थायी कर्मचारी करते थे।
  6. श्रम मानकों का कमजोर होना: संविदाकरण और गिग इकोनॉमी में बढ़ती अस्थिरता श्रमिकों के अधिकारों को कमजोर करती है और श्रम मानकों को कम करती है। ट्रेड यूनियनों की संख्या में कमी और सौदेबाजी के विकेंद्रीकरण से राजनीतिक संघवाद का हाशिए पर जाना भी रोजगार की स्थिति में गिरावट का संकेत देता है।
  7. सामाजिक और भावनात्मक प्रभाव: संविदा कर्मचारियों को अपनी "संविदा" पहचान को छिपाने की आवश्यकता महसूस होती है, और वे दूसरों को संविदा वाली नौकरियों में न जाने की सलाह देते हैं। उनकी संविदा रोजगार की स्थिति उनकी शादी की संभावनाओं और सामाजिक प्रतिष्ठा को भी प्रभावित करती है।

कानूनी और न्यायिक परिप्रेक्ष्य: भारतीय श्रम कानून स्थायी प्रकृति के कार्यों के लिए स्थायी दैनिक-मजदूरी या संविदा नियुक्तियों का दृढ़ता से विरोध करता है। सर्वोच्च न्यायालय ने शंकर मुखर्जी बनाम भारत संघ के मामले में ठेकेदारों के माध्यम से रोजगार की प्रथा को "पुराना", "आदिम" और "हानिकारक" बताया, इसे "बंधुआ मजदूरी का एक बेहतर संस्करण" कहा जिसे समाप्त किया जाना चाहिए।

  • नियमितीकरण के सिद्धांत: सर्वोच्च न्यायालय के उमादेवी (2006) और बीएसएनएल (2011) जैसे महत्वपूर्ण फैसलों ने भारत में संविदा रोजगार और नियमितीकरण की कानूनी समझ को आकार दिया है। उमादेवी ने पिछले दरवाजे से प्रवेश पर अंकुश लगाने और संवैधानिक सिद्धांतों का पालन सुनिश्चित करने की मांग की थी, वहीं बीएसएनएल के फैसले ने दीर्घकालिक संविदा श्रमिकों के अधिकारों का विस्तार किया। अदालत ने जोर दिया कि नियामक प्राधिकरण कानूनों की अनदेखी नहीं कर सकते हैं, लेकिन राज्यों का यह दायित्व है कि वे उन कर्मचारियों के नियमितीकरण पर विचार करें जो लंबे समय से महत्वपूर्ण भूमिकाओं में काम कर रहे हैं।
  • "नकली अनुबंध" (Sham Contracts): अदालतों ने "नकली अनुबंध" के उदाहरणों की पहचान की है, जहां नियोक्ता और संविदा श्रमिक के बीच "नियोक्ता-कर्मचारी" जैसा संबंध मौजूद होता है, लेकिन इसका उद्देश्य उन लाभों को रोकना होता है जो इन श्रमिकों को नियमित कर्मचारी होने पर मिलते।
  • न्यूनतम मजदूरी और सामाजिक सुरक्षा: संविदा श्रमिकों को भी भविष्य निधि (PF) लाभ का अधिकार है। यदि ठेकेदार भविष्य निधि बकाया का भुगतान करने में विफल रहता है, तो प्रधान नियोक्ता जिम्मेदार होता है।

सुझाव और समाधान: इन चुनौतियों का समाधान करने के लिए कानून में सुधार, मजबूत प्रवर्तन तंत्र और श्रमिकों के अधिकारों के बारे में जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है। सरकारी संस्थानों को उचित और स्थिर रोजगार प्रदान करके एक मिसाल कायम करनी चाहिए। हिमाचल प्रदेश ने हाल ही में एक अधिनियम लागू करके संविदा आधार पर नियुक्तियों पर प्रतिबंध लगा दिया है।

संविदाकरण के बढ़ते चलन के कारण रोज़गार की स्थितियों में गिरावट भारत के श्रम बाजार में एक महत्वपूर्ण और जटिल चुनौती है, जिसके लिए श्रमिकों के अधिकारों और आर्थिक विकास के बीच संतुलन सुनिश्चित करने के लिए बहुआयामी हस्तक्षेप की आवश्यकता है।

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